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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
स दीर्घवाहुर्दृढधन्वा महात्मा; भिन्द्याद्गिरीन्संहरेत्सर्वलोकान् |  ४३   क
अस्त्रे कृती निपुणः क्षिप्रहस्तो; दिवि स्थितः सूर्य इवाभिभाति ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति