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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
पदातिसङ्घान्रथसङ्घान्समन्ता; द्व्यात्ताननः काल इवाततेषुः |  ५४   क
प्रणोत्स्यामि ज्वलितैर्वाणवर्षैः; शत्रूंस्तदा तप्स्यति मन्दवुद्धिः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति