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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
सर्वा दिशः सम्पतता रथेन; रजोध्वस्तं गाण्डिवेनापकृत्तम् |  ५५   क
यदा द्रष्टा स्ववलं सम्प्रमूढं; तदा पश्चात्तप्स्यति मन्दवुद्धिः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति