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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
यदा रथे गाण्डिवं वासुदेवं; दिव्यं शङ्खं पाञ्चजन्यं हय़ांश्च |  ५८   क
तूणावक्षय़्यौ देवदत्तं च मां च; द्रष्टा युद्धे धार्तराष्ट्रः समेतान् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति