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वन पर्व
अध्याय २८७
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं प्राप्स्यसि कल्याणि कल्याणमनघे ध्रुवम् |  २९   क
कोपिते तु द्विजश्रेष्ठे कृत्स्नं दह्येत मे कुलम् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति