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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
अय़ं कवाटे निजघान पाण्ड्यं; तथा कलिङ्गान्दन्तकूरे ममर्द |  ७०   क
अनेन दग्धा वर्षपूगान्विनाथा; वाराणसी नगरी सम्वभूव ||  ७०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति