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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
प्राग्ज्योतिषं नाम वभूव दुर्गं; पुरं घोरमसुराणामसह्यम् |  ७४   क
महावलो नरकस्तत्र भौमो; जहारादित्या मणिकुण्डले शुभे ||  ७४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति