उद्योग पर्व  अध्याय ४७

सञ्जय़ उवाच

जानन्तोऽस्य प्रकृतिं केशवस्य; न्ययोजय़न्दस्युवधाय़ कृष्णम् |  ७६   क
स तत्कर्म प्रतिशुश्राव दुष्कर; मैश्वर्यवान्सिद्धिषु वासुदेवः ||  ७६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति