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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
तैश्चेद्युद्धं मन्यते धार्तराष्ट्रो; निर्वृत्तोऽर्थः सकलः पाण्डवानाम् |  ८   क
मा तत्कार्षीः पाण्डवार्थाय़ हेतो; रुपैहि युद्धं यदि मन्यसे त्वम् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति