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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
तस्मै वरानददंस्तत्र देवा; दृष्ट्वा भीमं कर्म रणे कृतं तत् |  ८०   क
श्रमश्च ते युध्यमानस्य न स्या; दाकाशे वा अप्सु चैव क्रमः स्यात् ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति