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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
हत्वा त्वहं धार्तराष्ट्रान्सकर्णा; न्राज्यं कुरूणामवजेता समग्रम् |  ९१   क
यद्वः कार्यं तत्कुरुध्वं यथास्व; मिष्टान्दारानात्मजांश्चोपभुङ्क्त ||  ९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति