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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
तथा हि नो मन्यतेऽजातशत्रुः; संसिद्धार्थो द्विषतां निग्रहाय़ |  ९४   क
जनार्दनश्चाप्यपरोक्षविद्यो; न संशय़ं पश्यति वृष्णिसिंहः ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति