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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
सुपर्णपाताश्च पतन्ति पश्चा; द्दृष्ट्वा रथं श्वेतहय़प्रय़ुक्तम् |  ९९   क
अहं ह्येकः पार्थिवान्सर्वय़ोधा; ञ्शरान्वर्षन्मृत्युलोकं नय़ेय़म् ||  ९९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति