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भीष्म पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
दरदैश्चूचुपैश्चैव तथा क्षुद्रकमालवैः |  १६   क
अभ्यरक्षत संहृष्टः सौवलेय़स्य वाहिनीम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति