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द्रोण पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
पिता तवाहवं त्यक्त्वा गतः कापुरुषो यथा |  ११   क
दिष्ट्या त्वमपि जानीषे योद्धुं न त्वद्य मोक्ष्यसे ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति