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द्रोण पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
शत्रुञ्जय़ं चन्द्रकेतुं मेघवेगं सुवर्चसम् |  १५   क
सूर्यभासं च पञ्चैतान्हत्वा विव्याध सौवलम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति