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द्रोण पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
शक्यं त्वस्य धनुश्छेत्तुं ज्यां च वाणैः समाहितैः |  २८   क
अभीशवो हय़ाश्चैव तथोभौ पार्ष्णिसारथी ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति