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द्रोण पर्व
अध्याय १५१
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सञ्जय़ उवाच
स मत्त इव मातङ्गः सङ्क्रुद्ध इव चोरगः |  ५   क
दुर्योधनमिदं वाक्यमव्रवीद्युद्धलालसः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति