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द्रोण पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
स छिन्नधन्वा विरथः स्वधर्ममनुपालय़न् |  ३४   क
खड्गचर्मधरः श्रीमानुत्पपात विहाय़सम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति