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द्रोण पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
मय़्येव निपतत्येष सासिरित्यूर्ध्वदृष्टय़ः |  ३६   क
विव्यधुस्तं महेष्वासाः समरे छिद्रदर्शिनः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति