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द्रोण पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणोऽच्छिनन्मुष्टौ खड्गं मणिमय़त्सरुम् |  ३७   क
राधेय़ो निशितैर्वाणैर्व्यधमच्चर्म चोत्तमम् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति