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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
स कर्णवाणाभिहतः किरीटी; भीमं तथा प्रेक्ष्य जनार्दनं च |  २७   क
अमृष्यमाणः पुनरेव पार्थः; शरान्दशाष्टौ च समुद्ववर्ह ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति