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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा गुरुवर्ती गुरुप्रिय़ः |  ९४   क
उच्छ्रित्य वाहू दुःखार्तः सस्वरं प्ररुरोद ह ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति