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कर्ण पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
कर्णं न चेदद्य निहन्मि राज; न्सवान्धवं युध्यमानं प्रसह्य |  १३   क
प्रतिश्रुत्याकुर्वतां वै गतिर्या; कष्टां गच्छेय़ं तामहं राजसिंह ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति