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कर्ण पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
संशप्तकैर्युध्यमानस्य मेऽद्य; सेनाग्रय़ाय़ी कुरुसैन्यस्य राजन् |  २   क
आशीविषाभान्खगमान्प्रमुञ्च; न्द्रौणिः पुरस्तात्सहसा व्यतिष्ठत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति