शल्य पर्व  अध्याय ४७

वैशम्पाय़न उवाच

पचस्वैतानि सुभगे वदराणि शुभव्रते |  १६   क
पचेत्युक्त्वा स भगवाञ्जगाम वलसूदनः ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति