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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य तां तु कल्याणीं ततो जप्यं जजाप सः |  १७   क
अविदूरे ततस्तस्मादाश्रमात्तीर्थ उत्तमे |  १७   ख
इन्द्रतीर्थे महाराज त्रिषु लोकेषु विश्रुते ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति