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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
भरद्वाजस्य दुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि |  २   क
स्रुचावती नाम विभो कुमारी व्रह्मचारिणी ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति