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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूय़िष्ठशो नराः |  ५०   क
हर्तुं व्यवसिता राजन्माय़ाचारसमन्विताः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति