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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
चरणौ दह्यमानौ च नाचिन्तय़दनिन्दिता |  २३   क
दुःखं कमलपत्राक्षी महर्षेः प्रिय़काम्यया ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति