अनुशासन पर्व  अध्याय ३०

शक्र उवाच

वह्वीस्तु संसरन्योनीर्जाय़मानः पुनः पुनः |  ७   क
पर्याय़े तात कस्मिंश्चिद्व्राह्मण्यमिह विन्दति ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति