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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
उवाच च सुरश्रेष्ठस्तां कन्यां सुदृढव्रताम् |  २५   क
प्रीतोऽस्मि ते शुभे भक्त्या तपसा निय़मेन च ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति