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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
तेषां वृत्त्यर्थिनां तत्र वसतां हिमवद्वने |  ३०   क
अनावृष्टिरनुप्राप्ता तदा द्वादशवार्षिकी ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति