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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
ते कृत्वा चाश्रमं तत्र न्यवसन्त तपस्विनः |  ३१   क
अरुन्धत्यपि कल्याणी तपोनित्याभवत्तदा ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति