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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच ततः सा तं व्राह्मणं चारुदर्शना |  ३४   क
क्षीणोऽन्नसञ्चय़ो विप्र वदराणीह भक्षय़ |  ३४   ख
ततोऽव्रवीन्महादेवः पचस्वैतानि सुव्रते ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति