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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्ता सापचत्तानि व्राह्मणप्रिय़काम्यया |  ३५   क
अधिश्रित्य समिद्धेऽग्नौ वदराणि यशस्विनी ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति