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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
उपसर्पस्व धर्मज्ञे यथापूर्वमिमानृषीन् |  ३९   क
प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञे तपसा निय़मेन च ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति