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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः सन्दर्शय़ामास स्वरूपं भगवान्हरः |  ४०   क
ततोऽव्रवीत्तदा तेभ्यस्तस्यास्तच्चरितं महत् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति