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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
भवद्भिर्हिमवत्पृष्ठे यत्तपः समुपार्जितम् |  ४१   क
अस्याश्च यत्तपो विप्रा न समं तन्मतं मम ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति