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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
अनय़ा हि तपस्विन्या तपस्तप्तं सुदुश्चरम् |  ४२   क
अनश्नन्त्या पचन्त्या च समा द्वादश पारिताः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति