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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
तथास्मिन्देवदेवेश त्रिरात्रमुषितः शुचिः |  ४५   क
प्राप्नुय़ादुपवासेन फलं द्वादशवार्षिकम् |  ४५   ख
एवमस्त्विति तां चोक्त्वा हरो यातस्तदा दिवम् ||  ४५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति