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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
ऋषय़ो विस्मय़ं जग्मुस्तां दृष्ट्वा चाप्यरुन्धतीम् |  ४६   क
अश्रान्तां चाविवर्णां च क्षुत्पिपासासहां सतीम् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति