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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वेकां रजनीं तीर्थे वत्स्यते सुसमाहितः |  ५१   क
स स्नात्वा प्राप्स्यते लोकान्देहन्यासाच्च दुर्लभान् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति