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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा भगवान्देवः सहस्राक्षः प्रतापवान् |  ५२   क
स्रुचावतीं ततः पुण्यां जगाम त्रिदिवं पुनः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति