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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृज्य तु शुभं देहं जगामेन्द्रस्य भार्यताम् |  ५५   क
तपसोग्रेण सा लव्ध्वा तेन रेमे सहाच्युत ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति