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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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जनमेजय़ उवाच
का तस्या भगवन्माता क्व संवृद्धा च शोभना |  ५६   क
श्रोतुमिच्छाम्यहं व्रह्मन्परं कौतूहलं हि मे ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति