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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
भारद्वाजस्य विप्रर्षेः स्कन्नं रेतो महात्मनः |  ५७   क
दृष्ट्वाप्सरसमाय़ान्तीं घृताचीं पृथुलोचनाम् ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति