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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
स तु जग्राह तद्रेतः करेण जपतां वरः |  ५८   क
तदावपत्पर्णपुटे तत्र सा सम्भवच्छुभा ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति