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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
आजगामाश्रमं तस्यास्त्रिदशाधिपतिः प्रभुः |  ६   क
आस्थाय़ रूपं विप्रर्षेर्वसिष्ठस्य महात्मनः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति