शल्य पर्व  अध्याय ४७

वैशम्पाय़न उवाच

स्रुचावतीति धर्मात्मा तदर्षिगणसंसदि |  ६०   क
स च तामाश्रमे न्यस्य जगाम हिमवद्वनम् ||  ६०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति