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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्युपस्पृश्य महानुभावो; वसूनि दत्त्वा च महाद्विजेभ्यः |  ६१   क
जगाम तीर्थं सुसमाहितात्मा; शक्रस्य वृष्णिप्रवरस्तदानीम् ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति